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गिरीश कर्नाड जब 'मैं भी शहरी नक्सल' का बोर्ड उठाकर चल दिए थे

गिरीश कर्नाड की पहचान नाटककार, लेखक और निर्देशक के रूप में रही है. लेकिन, कई मायनों में उन्हें न सिर्फ़ कर्नाटक बल्कि देश में 'अंतरात्मा की आवाज़ सुनने' वाले के रूप में जाना जाता रहा है.
कई लोग उनके निधन के बाद भी सोशल मीडिया पर अपनी टिप्पणियों में उनके लिए सख़्त लफ़्ज़ों का इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले कुछ सालों में विभिन्न मसलों पर उन्होंने अपना अलग रुख़ रखा, फिर चाहे वो अठारहवीं सदी के शासक टीपू सुल्तान का मुद्दा रहा हो या फिर नोबेल विजेता साहित्यकार वीएस नायपॉल का या फिर शहरी नक्सल का मुद्दा.
लेकिन सच्चाई यही है कि कर्नाड सही मायने में ऐसे बुद्धिजीवी थे, जिन्होंने किसी पर रियायत नहीं बरती.
वह अपने विचारों को व्यक्त करने में क़त्तई नहीं हिचकिचाते थे और वो भी अपने अंदाज़ में, फिर चाहे सत्ता में कांग्रेस की सरकार रही हो, या फिर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन.
इंदिरा गांधी द्वारा लागू आपातकाल का विरोध करते हुए उन्होंने एफ़टीआईआई के निदेशक पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.
आपातकाल लागू करने के तुरंत बाद सरकार ने उन्हें तत्कालीन सरकार के प्रमुख नेताओं की प्रशंसा में फ़िल्में बनाने के लिए कहा गया था, लेकिन उन्होंने इससे इनकार करते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.
17 साल बाद, केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने सांप्रदायिक सद्भाव की आवश्यकता पर अयोध्या में एक सम्मेलन आयोजित किया था.
ऐसा उन्होंने तब किया था, जब वो व्यक्तिगत तौर पर वाजपेयी और रथयात्रा का नेतृत्व करने वाले लाल कृष्ण आडवाणी को जानते थे.
जाने-माने कन्नड़ लेखक और कर्नाटक नाटक अकादमी के पूर्व चेयरमैन के मारुलासिद्धप्पा ने बीबीसी हिंदी को बताया, "उस समय नफ़रत का ऐसा माहौल नहीं था, जैसा अब है. वह कभी किसी राजनीतिक दल के पक्ष में नहीं रहे. अलबत्ता वो सांप्रदायिक सौहार्द के तगड़े पैरोकार थे."
कर्नाड की सांप्रदायिक सौहार्द को लेकर प्रतिबद्धता बड़े पैमाने पर इतिहास के उनके गहन अध्ययन का विस्तार थी, जहाँ उन्होंने चिंतन किया और तुगलक़, द ड्रीम्स ऑफ़ टीपू सुल्तान (मूल रूप से बीबीसी रेडियो के लिए) ताले डंडा जैसे नाटक लिखे.
कन्नड़ लेखक मल्लिका घांटी कहते हैं, "उन्होंने अपने नाटकों के लिए इतिहास और पौराणिक कथाओं का विषय के रूप में इस्तेमाल किया और रंगमंच में एक क्रांति पैदा की. लेकिन आज की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं, जिन्हें उन्होंने देखा था, इसलिए आवाज़ उठाने वालों की संख्या में कमी आई. हालांकि कर्नाड एक ऐतिहासिक शख्सियत हैं, हमेशा समकालीन और उनके आलोचक भी इससे सहमत होंगे. उन्होंने कर्नाटक की आत्मा के रूप में काम किया."
इस तरह उन्होंने साल 2003 में कर्नाटक के चिगमंगलूर ज़िले में लेखकों के एक समूह का नेतृत्व किया, जिसने बांबाबुदंगिरी पहाड़ियों पर बने तीर्थस्थल पर दत्तात्रेय की मूर्ति स्थापित करने के संघ परिवार के प्रयासों का विरोध किया था.
श्री गुरु दत्तात्रेय बाबाबुदन स्वामी दरगाह के समकालिक मंदिर में मुस्लिम और हिंदू दोनों मज़हबों के लोग प्रार्थना किया करते हैं, लेकिन संघ परिवार का दावा था कि यह एक हिंदू मंदिर है और वो यहां दत्तात्रेय की मूर्ति स्थापित करना चाहता थे.
केंद्रीय साहित्य अकादमी के लिए कर्नाड की डॉक्यूमेंट्री को प्रोड्यूस करने वाले फ़िल्म निर्माता चैतन्य केएम कहते हैं, "हमने महसूस किया कि तब तत्कालीन (कांग्रेस) सरकार ठीक से काम नहीं कर रही थी. हमने वहाँ जाने का फ़ैसला किया. जब हम वहाँ पहुँचे तो पुलिस ने हमें बताया कि किसी को जाने नहीं दिया जाएगा. तब कर्नाड ने पुलिस से कहा कि वो हमें गिरफ़्तार कर सकते हैं."
चैतन्य ने कहा, "मैंने बाद में उनसे पूछा कि वह गिरफ्तारी देने के लिए क्यों राज़ी हुए. उन्होंने मुझे बताया कि हमारे प्रदर्शन का मूल आधार ही ये था कि हम क़ानून का सम्मान करते हैं. जो लोग धर्मस्थल को लेकर उपद्रव मचा रहे हैं, वो क़ानून का सम्मान नहीं कर रहे. इसी तरह, हमें उन्हें ये बताने की ज़रूरत है कि देश के क़ानून का सम्मान किया जाना चाहिए."
लेखक रेहमत तारिकेरे कहते हैं, "वह पारंपरिक सांचे में ढले व्यक्ति नहीं थे. मौलिक रूप से, कर्नाड समाज की ऐसी शख़्सियत थे जो जीवंत लोकतंत्र में यक़ीन करता था. वो हर उस शासन का विरोध करते थे जो प्रतिगामी था."

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